इश्क़ का सजदा करते है उसकी ताबीर करते हुऐ,
लेकिन इश्क़ के हर्फ़ ही हमसे खिलाफत करने लगे है,
तो क्या सुकून दे उस उन्स के मुसाफ़िर को,
जो उसके एक तबस्सुम के लिए फलक तक जाने को संजीदा हो
- शुभम पांथरी
"शायर की शायरी का यूँ मज़ाक़ न बनाओ जनाब, तिनका का भी अगर आँखों में चला जाये तो उनकी ज्योति ले लेता है, ये तो काफ़िर एक शायर है शब्दो की जवाला से खेलने की हिमाकत रखता है"
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